सप्ताहान्त – 30 जून, 2019

नकली अस्पताल व फर्जी डॉक्टरों का मायाजाल

देश में फर्जी डॉक्टरों और अस्पतालों के बढ़ते मायाजाल से मरीजों की जान जाने की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है। बिना किसी लाइसेंस व अधिकार के अस्पताल चल रहे हैं और उनमें फर्जी डिग्री धारी झोलाछाप डॉक्टर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। जब तक सब ठीक रहता है, सब चलता रहता है। लेकिन जैसे ही किसी मरीज की मृत्यु हो जाती है तो असलियत सामने आ जाती है। विभिन्न शहरों में अधिकारियों द्वारा छापे मारे जा रहे हैं, अस्पतालों को सील किया जा रहा है लेकिन इसके बावजूद भी यह गोरखधंधा बन्द होना तो छोड़िए,कम भी नहीं हो पा रहा। इसका मुख्य कारण हमारे देश में योग्य डॉक्टरों की कमी भी है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रति 1000 आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए, लेकिन भारत इस अनुपात को हासिल करने में बहुत पीछे है। यह अनुपात 2.5 के मुकाबले मात्र 0.65 ही है। पिछले 10 सालों में यह कमी तीन गुना तक बढ़ी है। तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने राज्यसभा में बताया था कि देशभर में 14 लाख डॉक्टरों की कमी है और प्रतिवर्ष लगभग 5500 डॉक्टर ही तैयार हो पाते हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों के मामले में तो स्थिति और भी बदतर है।

हमारे देश में न तो पर्याप्त अस्पताल हैं, न डॉक्टर, न नर्स और न ही सार्वजनिक स्वास्थ्य कर्मचारी। स्वास्थ्य देखभाल की क्वालिटी और उपलब्धता में बड़ा अंतर है। यह अंतर केवल राज्यों के बीच नहीं है, बल्कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में भी है। इसी स्थिति के कारण नीम-हकीम खुद को डॉक्टर की तरह पेश कर मौके का फायदा उठा रहे हैं। डॉक्टरों की अनुपस्थिति में लोगों के पास इलाज के लिए ऐसे फर्जी डॉक्टरों के पास जाने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार देश में 1.30 अरब लोगों की आबादी का इलाज करने के लिए महज 10 लाख एलोपैथिक डॉक्टर हैं। इनमें से भी सिर्फ 1.10 लाख डॉक्टर ही हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करते हैं। इस हिसाब से ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 90 करोड़ आबादी स्वास्थ्य देखभाल के लिए इन थोड़े से डॉक्टरों पर ही निर्भर है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के 57 फीसदी एलोपैथिक डॉक्टरों के पास मेडिकल योग्यता नहीं है। उनमें से एक तिहाई डॉक्टर ऐसे हैं, जो केवल सेकेंडरी स्कूल तक ही शिक्षित हैं और दूसरों का इलाज कर रहे हैं। सन 2011 की जनगणना के तथ्यों पर आधारित डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट ‘द हेल्थ वर्कफोर्स इन इंडिया’ के अनुसार प्रति एक लाख की आबादी पर बिहार में मात्र 13.7 और झारखंड में 15.2 डॉक्टर मेडिकल योग्यता रखते हैं। हालांकि वर्ष 2005 के बाद चिकित्सा के क्षेत्र में व्यापक बदलाव और विस्तार हुआ है। यह आम धारणा है कि बिना डिग्री के एलोपैथी की प्रैक्टिस करने वाले को क्वैक या झोलाछाप कहा जाता है। रिपोर्ट में बताया गया था कि वर्ष 2011 में देश के ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 18.8 प्रतिशत स्वास्थ्य कर्मी ही मेडिकल क्वालीफाइड थे। औसतन एक लाख की आबादी में 80 डॉक्टरों में 36 डॉक्टर ऐसे हैं, जिनके पास एलोपैथिक, होम्योपैथिक, आयुर्वेदिक और यूनानी से संबंधित कोई भी मेडिकल सर्टिफिकेट नहीं है।

सरकार को चाहिए कि तुरन्त ऐसी कार्य योजना बनाई जाए जिससे योग्य डॉक्टरों की संख्या बढ़े,विदेशों में डॉक्टरी की पढ़ाई करने जाने वाले वहां से देश वापस आएं, डॉक्टरों का विदेशों में पलायन न हो । तभी इन झोलाछापों के चंगुल से बचा जा सकेगा।

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